Monday, 13 February 2017

प्यार महज इक शब्द ही तो था....!!!

प्यार महज इक शब्द ही तो था मेरे लिए,
पर तुमसे मिलने के बाद,
प्यार एहसास बन कर मुझे छू गया....
तुम क्या मिले..
प्यार के हज़ारों रंग मिल गए,सुबह,शाम,चाँद,तारे,बारिश,धुप,छाव...
जैसे हर शै में प्यार ही प्यार हो...
तुमसे जब से मिली,
नजरिये सारे जिंदगी के बदल गये,
बहुत गुमान था मुझे कि,
मैं नही किसी का इन्तजार करुँगी,
बहुत शर्ते लगी थी सखियों में कि,
मैं कभी इस तरह ना किसी से प्यार करूँगी...

तुमने कभी कहा नही पर,
तुम्हारे प्यार में हूँ,
ये बात ना कब दिल में उतर गयी,
तुमसे परे कुछ भी सोचना जैसे,
कोई अपराध लगता है,
तुमने कभी नही जताया,पर ,
इस तरह मुझ पर,
तुम्हारा अधिकार लगने लगा...

इस भीड़ में इक चेहरा कैसे,
इतना खास हो जायेगा,
ये तो सोचा ही नही था...
इस पूरी दुनिया में,
तुम ही मेरी दुनिया बन गये...
जादू ही तो जो इक बार चला तो,
फिर नही उतरा,
बस हद से ज्यादा गुजरता चला गया....

जब तक तुमसे नही मिली थी,
तब तक मैं इक स्त्री आजादी,
उसके स्वाभिमान,उसके आत्मसम्मान,
की बाते करती थी...
बाते आज भी वही है..
तुमसे मिल कर इन शब्द को अर्थ मिल गया,
मैंने जाना कि प्यार में,
इक स्त्री कमजोर नही होती,
समर्पित होती है....
ये समर्पण मैंने तुमसे मिलने के बाद समझा है...

प्यार में होना भी इक कला है,
मंदिरो की घंटियों सा गूंजता है,
तुम्हारा कहा इक-इक शब्द,
मेरे-तुम्हारे रिश्ते को मौली में बांध आती हूँ,
मंदिर की चौखट पर....
तुम्हे अपना सम्मान मान कर,
सजा लेती सिंदूर की तरह अपने मस्तक पर....

प्यार खुद अधूरा होकर भी पूर्ण है...
जिसने इसे महसूस कर लिया,
वो जी रहा है,वो भूल गया खुद को,
किसी के लिए...
मान लिया आधार किसी को जिंदगी के लिए...
प्यार महज इक शब्द ही तो था मेरे लिए...

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